‘अनुनाद’ में गूंजीं निधीश की कविताएं‘

अनुनाद’ हिन्दी कविता का बहुवचन में रचना पाठ का शुभारंभ 24 जनवरी, 2020 को अंतरंग, भारत भवन, भोपाल में सुबह 11बजे वरिष्ठ कवि श्री राजेश जोशी की अध्यक्षता में हुआ। इस अवसर पर कार्यक्रम की शुरुआत में श्री रामचन्द्र सिंह के निर्देशन में तैयार ‘आदि वाद्य वृन्द’ की सुरम्य प्रस्तुति। 

कुसुम माधुरी टोप्पो ने ‘दो पाटों में बटी आदिम जाति’, ‘एक सवाल’, ‘मैं आदिवासी’, ‘तोड़ रही वह तेंदु पत्ता’, ‘आरक्षण’आदि कई कविताओं का पाठ किया। अपनी कविता ‘दो पाटों में बटी आदिम जाति’ के कुछ अंश इस प्रकार सुनायाः- दो पाटों में बटी आदिम जाति/गुजरे दिन थे/जब उल्लासित होती प्रकृति/करमा सरहुल के पराग झरते रात भर/मजबूती से एक दूसरे का/हाथ पकड़कर/मांदर की थाप पर/डूब जाता था आदिम गांव/कंठों में उतर अरविल स्वर/द्वेष राग की गंध दूर तक नहीं/निश्छल पे्रम की धारा बहती/धीरे-धीरे वक्त ने करवट ली/धर्म का डंका बजा/दो पाट में बट गई आदिम जाति।

इसके बाद विश्वासी एक्का ने ‘सतपुड़ा के जंगल’, ‘क्या तुम्हें पता है’, ‘तुम्हें पता न चला’, ‘लछमनिया का चूल्हा’, ‘रुई सी खुशियो’, ‘बिरसो’ आदि कविताओं का पाठ किया। अपनी कविता ‘तुम्हें पता न चला’ के कुछ इस प्रकार पढ़ीं- तुम मगन हो नृत्य करते रहे/मांदल की थाप पर झूमते रहे/जंगल भी गाने लगा तुम्हारे साथ/उत्सवधर्मी थे तुम/कोई अंगार रख गया सूखे पत्तों के बीच/बुधुवा तुम्हें पता न चला।

तत्पश्चात वंदना टेटे ने ‘अपनी बात कहते हैं’, ‘हम धरती की माड़ हैं’, ‘पुरखों का कहन’ आदि कविताओं का पाठ किया। ‘अपनी बात कहते हैं’ के अंश- हम कविता नहीं करते/अपनी बात कहते हैं/जैसे कहती है धरती/आसमान पहाड़, नदियां/जैसे कहते हैं/कुसुम के फल/महुआ के फूल/जामुन की गंध/कटहल की मिठास/अभी-अभी पैदा हुआ जीव/और जंगल की सनसनाती हवा/हम गीत नहीं गाते/मैना की तरह कूकते हैं/मेमनों की तरह मिमियाते हैं/मेढकों की तरह टर्राते हैं/बारिश के जैसा धीमे-धीमें महीनों गुनगुनाते हैं।

महादेव टोप्पो ने ‘जंगल पहाड़’ पुस्तक के माध्यम से पुरुषों और दोस्तों को याद करती कविताएं सुनाईं। अरुण आदित्य ने अन्योन्याश्रित कविता के  माध्यम से सहिष्णुता के भाव का वर्णन किया। उन्होंने अपने कविता के क्रम में ‘पहाड़ झांकता है नदी में’ आदि कई कविताएं सुनाईं।

अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने कहा कि 1990 के दशक तक की कविताओं में सभी वर्गों की आवाज रहती थी, किन्तु उसके बाद की कविताओं में दलित, आदिवासी और स्त्राी विमर्श जैसे विषय भी शामिल हो गये हैं और नये शब्द आने से हिन्दी भाषा का विस्तार हुआ है। आज देखें तो बहुत सारे विमर्श उठ खड़े हुए हैं। आज सभी कवियों ने अपनी-अपनी कविताओं में उस भूमि से जुड़ी कतिवाएं सुनाईं, जिसे किस तरह से जन-जंगलों से अलग किया जा रहा है। कविताओं को कागज पर उकेरने के बाद किस-किस तरह से भाषा बोलती है यह कागज की सार्थकता है। आज इस अनुनाद के माध्यम से सभी की कविताओं ने विस्तार दिया और इन सभी की भाषा ने भी हमें समृद्ध किया है।

इसी दिन सायं 6 बजे श्री बद्रीनारायण की अध्यक्षता में जमुना बीनी, अशोक शाह, असंग घोष, निधीश त्यागी और अन्ना माधुरी तिर्की रचना ने रचनाओं का पाठ किया। 25 जनवरी, 2020 को सुबह 11.00 बजे बजरंग बिहारी की अध्यक्षता में अनीता भारती, विहाग वैभव, बहादुर पटेल, करमानंद आर्य, पूनम वासम और अरबाज खान रचना पाठ करेंगे।

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