डॉ. कुमकुम गुप्ता की पुस्तक 'जीना कुछ इस तरह' पर चर्चा आयोजित

माटी और संस्कृति से जुड़ी कर्मठ लेखिका : डॉ. कुमकुम गुप्ता


भोपाल। शुक्रवार 6 दिसम्बर को आर्यसमाज भवन , भोपाल में हिन्दी लेखिका संघ मध्यप्रदेश द्वारा डॉ. कुमकुम गुप्ता की " जीना कुछ इस तरह " पुस्तक पर चर्चा आयोजित की गई । चर्चा-विमर्श के दौरान कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. रामवल्लभ आचार्य ने कहा कि , " सृष्टि पुरुष और प्रकृति का संगम है । नारी और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं । स्त्रियों का लेखन जिम्मेदारियों के निर्वहन के साथ चलता है । उसकी संवेदनाएँ उसकी कविताओं में झलकती हैं । वह बंधनों के साथ आगे बढ़ती है , अपने स्वप्न और इच्छाओं का दमन करते हुए साहित्य रचती है , वही पीड़ा उसकी कलम में उभर जाती है । "

अघ्यक्ष अनिता सक्सेना ने कुमकुम गुप्ता को लेखिका संघ की नींव बताया । उन्होंने कहा कि कुमकुम जी संस्कृति और मिट्टी से जुड़़ी एक कर्मठ और स्पष्ट वक़्ता हैं । साथ ही उन्होंने परिवार को पहली प्राथमिकता बताते हुए कहा कि नारी जिम्मेदारियों से पलायन न करते हुए भी अपने भावों को साकार करती हैं जो उसकी सृजनात्मकता को दर्शाता है।

विशिष्ट अतिथि श्री युगेश शर्मा ने कहा कि , " जो जागरूक रचनाकार होता है , वह वैचारिक चेतना के आसमान को छूता है और मंगलमय जीवन का मार्ग प्रशस्त करता है । उन्होंने संग्रह को यथार्थवादी और लालित्यपूर्ण बताया । 

डॉ. कुमकुम गुप्ता ने स्वागत उद्धबोधन के साथ अपनी कविता संग्रह के संदर्भ में कहा कि " मेरे लिए कविता जीवन की अनुभूतियाँ , कष्ट का अहसास हैं । मैंने उन्हें ही अपनी कविता के माध्यम से शब्द दिए हैं ताकि जब मैं स्वयं अपने जीवन की समीक्षा करूँ तो गर्व से कह सकूँ मैंने जीवन की मधुर लय को नहीँ खोया , उसकी सार्थकता बनाये रखी । "

कविता संग्रह की समीक्षा करते हुए डॉ. अर्चना निगम ने कहा कि " ये संवेदनशील मन द्वारा रची गईं कविताएँ हैं । स्त्री केंद्रित ये कविताएँ नारी मन की छटपटाहट को व्यक्त करती हैं । स्त्री को अपने सम्पूर्ण उत्तरदायित्व को निभाने के बावज़ूद कुछ अलग करने के लिए अनेक दुविधाओं का सामना करना पड़़ता है और यही दुविधा के भाव इस कविता संग्रह में भी परिलक्षित होते हैं । " डॉ. प्रीति प्रवीण खरे ने अपनी समीक्षा में कहा कि " कविता कवि के मन से अंकुरित होती है । दिखाई दे रहे दृश्यों , घटनाओं को शब्द देना कविता नहीं है बल्कि ये उसको रचने की ओर बढ़ने का प्रथम कदम है । उन्होंने इस संग्रह की कविताओं को स्त्री केंद्रित और लोक की अनुभूतियों में गहरे रचे - बसे हुए बताया । 

सरस्वती वंदना डॉ. वर्षा चौबे , सन्चालन कीर्ति श्रीवास्तव और धन्यवाद ज्ञापन सुनीता यादव ने व्यक्त किया । बड़ी संख्या में साहित्यिक बंधुओं की उपस्थिति ने कार्यक्रम को भव्य व गरिमामय बना दिया ।

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